नोट बंदी की मार से कराहा चमड़ा उद्योग, छंटनी शुरू

कानपुर संवाद

श्रम की अधिकता वाले चमड़ा उद्योग पर बड़े नोट बंदी की बड़ी मार पड़ी है। ये इकाइयां न तो अपने यहां काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों का भुगतान दे पा रही हैं और न ही कच्चा माल खरीद पा रही हैं। कंपनियों को यह डर भी सता रहा है कि इससे उत्पादन लागत बढ़ जाएगी। नतीजतन कई इंडस्ट्रियों ने दिहाड़ी श्रमिकों की छंटनी शुरू कर दी है।चमड़ा उद्योग बड़े संकट से जूझ रहा है। टेनरियों में स्थायी कर्मचारियों के अलावा भारी संख्या में दिहाड़ी मजदूर भी काम करते हैं। इन्हें रोजाना के हिसाब से मजदूरी भुगतान करना होता है। धन निकासी पर प्रतिबंध, छोटे नोट का बाजार में संकट के चलते श्रमिकों की संख्या की जा रही है। कई इकाइयों ने 40 फीसदी मजदूरों की छुट्टी कर दी है।चमड़ा उद्योग से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों को ठिकाने लगाने की नीयत से कई इकाइयों ने तो अपने कर्मचारियों को छह माह का वेतन और बोनस भी भुगतान के तौर पर दे दिया है। इससे उनके पास पड़े पुराने नोट खपाने में मदद मिलेगी। चमड़ा कारोबारियों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है लेकिन धन निकासी की सीमा अब खत्म करने की मांग की है। उद्यमियों का कहना है कि टेनरी उद्योग को पिछले छह माह में की गई कुल निकासी के दैनिक औसत के बराबर धन निकालने की मंजूरी दी जाए। ऐसा होने से इकाइयों को अपने मजदूरों की मजदूरी भुगतान और अन्य जरूरी खर्चे पूरे करने में सहूलियत होगी। लेदर कारोबारियों का कहा है कि टेनरी में काम करने वाले अधिसंख्य मजदूरों के पास बैंक खाते नहीं है। उन्हें हर महीने या हफ्ते, पंद्रह दिन में नगद भुगतान करना पड़ता है।24 हजार रुपए होने के नाते मजदूरों को हटाना मजबूरी बन गई। 15 दिन में जामजऊ, उन्नाव और बंधर की करीब 40 फीसदी इंडस्ट्रियों ने भारी संख्या में छंटनी की है।

नगदी के संकट से इंडस्ट्री की हालत खराब होती जा रही है। इसके चलते मजदूरों की छंटनी मजबूरी बन गई है। कई टेनरियों ने 40 फीसदी श्रमिकों को हटा दिया है। – असद कमाल इराकी-एक्सपोर्टर निदेशक मैपिल वुड

कई छोटी इकाइयां बंद हो गई हैं। इन कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को साप्ताहिक और रोजाना भुगतान करना पड़ता था। नगदी के संकट में भुगतान नहीं हो पा रहा था। – नय्यर जमाल महामंत्री स्माल टेनर्स एसोसिएशन

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